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स्वतंत्रता और निजता

                      स्वतंत्रता के बिना मनुष्य उसी प्रकार है जैसे बिना पहिये की रेलगाड़ी। यदि हम मनुष्य को एक विवेकशील प्राणी मानते हैं तब यह अति आवश्यक हो जाता है कि उसकी स्वतंत्रता का हनन न हो। बात यदि उस शासन की,  जो लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा प्रशासन की बात करता हो तब स्वतंत्रता ही शायद सब कुछ हो जाती है। यद्यपि किसी की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ तक दूसरे की स्वतंत्रता का हनन ना हो परन्तु लोकतंत्र की इसके बिना हम कामना भी नहीं कर सकते।
                   वर्तमान में सरकार के आधार कार्ड के प्रति प्रेम को देखते हुए मनुष्य की स्वतंत्रता और निजता के ऊपर सवालिया निशान लग गया है। यदि हम बिश्व के अन्य देशों जैसे कि इंग्लैंड की बात करें तो वहां  निजता एक प्रावधान के रूप में सरकार ने उपलब्ध करवायी और उसके साथ ही जनता को यह विश्वास दिलाया कि उनकी निजता के साथ कोई भी खिलवाड़ नही होगा।यदि हम भारत की बात करें तो सविंधान के मौलिक अधिकार अमेरिका से लिए गये हैं अतः उस समय वहां के सविंधान में निजता प्रत्यक्ष रूप से सविंधान में शामिल नहीं थी परंतु अप्रत्यक्ष रूप से जरूर शामिल थी।अतः भारतीय सविंधान में भी अनुच्छेद 21 में निजता कहीं न कहीं शामिल है ।
             आधार कार्ड के नए रूप ने निजता के मुद्दे पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं -
सबसे पहला कि क्या लोकतंत्र का अस्तित्व बिना स्वतंत्रता और निजता के सम्भव है।
दूसरा क्या सरकार लोगों की गोपनीयता सम्बन्धी सुरक्षा मुहैया करा पाएगी।
क्या वर्तमान में निजता उसी रूप में है जब लोग बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे।
                यदि लोकतंत्र में एक जवाबदेही सरकार की हम कामना करते हैं तब सरकार को कि क्या निजता मौलिक अधिकार है या नहीं , उच्चतम न्यायालय के पास नहीं भेजना चाहिए था।संसद को यह अधिकार है कि वह लोगों के लिए उचित कानून बनाए तब उसे निजता के मामले को भी स्वयं तय करना चाहिए था। परंतु सरकार इस मुद्दे को उच्चतम न्यायालय के पास भेज कर अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ कर किनारे हो गई। यदि हम सरकार के  पक्ष से बात करें तब यह निकल कर आता है कि क्या  निजता को पूर्ण रुप से शामिल कर प्रशासन चला सकते हैं।यदि एक मनुष्य अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजता है अपनी निजता का हवाला देकर तब प्रशासन अपना काम कैसे करेगा।सरकार आपराधिक गतिविधियों के होने पर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट सकती है।  फिर ऐसा कौन सा उचित रास्ता निकल के आए जिसमें प्रशासन भी सुचारु रूप से चले और व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता भी बनी रहे? यदि कुछ ऐसा हो रहा है जिसके कारण मनुष्य की निजता  प्रभावित हो रही है जिसके कारण उसकी अपनी जिंदगी से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हो रही  है तब इसमें कहीं ना कहीं सरकार की लापरवाही नजर आती है। ऐसे कई उदाहरण शामिल हैं जिसमें व्यक्ति की निजता प्रभावित हुई है। एक उदाहरण महेन्द्र सिंह धोनी का भी है। अतः सरकार को भरोसा दिलाना पड़ेगा, एक दायरा तय करना पड़ेगा कि किस सीमा तक कौन सी कंपनी दस्तावेज मांग सकती है।केवल सभी जगह आधार से जोड़ देने मात्र से काम नहीं चलेगा।

                         सलमान अली

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